| ألا يا سيّد العلماءِ طرّاً |
|
| ورَبَّ الجودِ والمجدِ الأثيلِ |
|
| ويا حلوَ المذاقة يومَ يفتي |
|
| بجود الطبع والفعل الجميلِ |
|
| أضرَّ بنا فدتك النفس جوع |
|
| ويعجبنا مربّى الزنجفيل |
|
| وأذهلنا إليه اليومَ شوقٌ |
|
| فكِدْنا أنْ نصيرَ بلا عقولَ |
|
| ومثلُكَ من يجودُ بما لديه |
|
| ويسخو بالكثير من القليل |