| يا مُنيَة َ النّفسِ حَسبي، من تَشكّيكِ، |
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| أنّي أُصابُ، وكفُّ الدّهرِ تَرميكِ |
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| ولو تَسامَحَ خَطبٌ في فِدائِكِ بي، |
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| لكنتُ مهما عرا خطبٌ أفديكِ |
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| وكيفَ أُعفي بلَيلٍ تَسهَرينَ بهِ، |
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| أو أستَسِيغُ شَراباً ليسَ يُروِيكِ؟ |
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| هنيدَ أوجعتِ قلباً قد أقمتِ يهِ |
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| ما بالُ طَرفي، وما يُدريكِ، يَبكيكِ |
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| فرُبّ لُؤلؤِ دَمعٍ كنتُ أذخَرُهُ |
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| عِلقاً أُغالي بهِ، أرخَصتُهُ فيكِ |
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| و إن نأى بكِ ربعٌ غيرُ مقتربٍ |
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| أوِ احتَواكِ حِجابٌ فيهِ يُقصِيكِ |
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| فإنّ كلّ نَسيمٍ، خاضَهُ أرَجٌ، |
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| رسولُ شوقٍ أتى عني يحييكِ |
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| ورُبّما شَفَعَتْ لي غَفوَة ٌ نَسَخَتْ |
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| أخرى الظلامِ فباتَ الطيفُ يدنيكِ |