| وَقَفَ الرَّبْع على مُرْتَبَعٍ |
|
| قد خلا يا سعدُ من آل سعاد |
|
| ورسومٍ رحت أستسقي لها |
|
| من عيون الركب منهلَّ الغوادي |
|
| فبكاها كلُّ صبٍّ بدمٍ |
|
| نائباً عنى وما ذاك مرادي |
|
| وهذيم لم يجد ممّا به |
|
| جلداً وهو قويٌّ في الجلاد |
|
| فتعجبت على علمي به |
|
| أنّه صَلْدُ الصفا واري الزناد |
|
| من صبابات جوى ً أضمرها |
|
| ودموعٍ فوق خدَّيه بوادي |
|
| قائلاً كيف مَضَتْ أيامنا |
|
| وهوى ً لم يك منها بالمعاد |
|
| وکنقضى المعهد فَلِمْ لا تنقضي |
|
| زفرات الوجد من هذا الفؤاد |