| نَفسي الفِداءُ لمقتولٍ على ظمأٍ |
|
| لم يُسقَ إلاَّ بحدِّ البيضِ والأسلِ |
|
| نفس الفداءُ له من هالكٍ هلكت |
|
| له الهداية من علمٍ ومن عمل |
|
| قرت به أعين الأعداء شامتة ً |
|
| وأسْخِنَتْ أعينُ الأملاكِ والرُّسلِ |
|
| أفدِيه مستنصراً قد قلَّ ناصرُه |
|
| ومستضاماً قليل الخيل والخول |
|
| يا صرعة ً صُرِعَتْ شمُّ الأنوف بها |
|
| وأصبح الدين منها عاثر الأمل |
|
| قد أثكلت بضعة المختار فاطمة ً |
|
| وأوْجَعت قلب خَيْرِ الأوصياءِ علي |