| لوَ انّكَ بالقَريضِ قَصَدتَ حمدي |
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| لكنتَ معَ الإيابِ حمدتَ قصدي |
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| ولكن رُمتَ بالشّعرِ امتِحاني، |
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| فجاءَكَ مثلهُ دباً بقردِ |
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| كسوتكَ من قشيبِ الشعرِ برداً |
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| يهجنُ شعرَ بشارِ بن بردِ |
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| وكنتُ عزمتُ أن أوليكَ براً، |
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| وأحملَ في الإجازة ِ وسع جهدي |
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| فلوح لي قريضكَ بافتخارٍ، |
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| وعُجبٍ جاءَ عن تَصعيرِ خَدّ |
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| فصَيّرتُ القريضَ لهُ جزاءً، |
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| وقلتُ: جُزيتَ عن نَحسٍ بسَعدِ |