| كيفَ صَبري، وأنتَ للعَينِ قُرّه، |
|
| وهيَ ما إن تَراكَ في العامِ مَرّه |
|
| وبماذا يسرّ قلبي، إذا غبْـ |
|
| ـتَ، إذا كنتَ للقُلوبِ مَسَرّه |
|
| قَسَماً بالذي أفاضَ على طَلـ |
|
| ـعتِكَ النّورَ، فهيَ للشّمسِ ضَرّه |
|
| إنّ يوماً أرى جَمالَكَ فِيهِ، |
|
| هوعندي في جبهة ِ الدهرِ غرّه |
|
| أيّها المعرضُ الذي هانَ عندي |
|
| تعبي فيه، واحتمالُ المضرّه |
|
| راقِبِ اللَّهَ في حُشاشَة ِ نَفسي، |
|
| إنهُ لا يضيعُ مثقالُ ذرّة |