| قف بالحمى بعدَ البدور وناد |
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| أرأيت كيف خبا ضياء النادي |
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| ومحامل ظعنت بمهجة ناحل |
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| أرأيت من حملوا على الأعواد |
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| لو رمت أن أفدي الحبيب بمهجتي |
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| وهو الأصحّ وفاد كنت الفادي |
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| هيهات يعدل ما ضيا ماقرّ لي |
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| طرف وجنة مهجتي بسواد |
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| أما سواد الليل فهو كما ترى |
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| طرف المنام على الدوام سهادي |
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| بكرت على مثواك أدمعُ نائح |
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| كالنيلِ ذات وفاً وذات منادي |
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| سخنت كحمام عليك مدامعي |
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| لما رزئت بكوكبٍ وقّاد |