| أُنظرْ إِلى نقشيَ البديعِ |
|
| يسليكَ عن زهرة ِ الربيعِ |
|
| لو جُنِيَ البحرُ مِنْ رياضٍ |
|
| كانَ جنَى روضيَ المريعِ |
|
| سقانيَ اللهُ دمعَ عيني |
|
| ولا وَقَاني جَوَى ضُلُوْعِي |
|
| فما أُبالي شقاءَ بَعْضِي |
|
| إِذا تَشَقَّيْتُ في جميعي |
|
| كيفَ تراني - وُقِيْتَ مابي- |
|
| أَلَسْتُ مِنْ أَعْجَبِ الرُّبُوعِ؟ |